Friday, September 21, 2018

हैदराबाद मध्ये कायकाय पहाल ?

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          हैदराबाद मध्ये कायकाय पहाल ?

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           1. गोवळकोंडा किल्ला,हैद्राबाद
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 गोवळकोंडा किल्ला हा हैद्राबादच्या गतकालीन वैभवशाली इतिहासाचा एक भग्न साक्षीदार आहे शहरापासून १६ की.मी.वर. कुतुबशाही साम्राज्याची जवळजवळ दोन शतके राजधानी असलेल्या या किल्याच्या बाह्य भिंतीचा घेर ७ कि.मी. असून, त्या काळी राजाबरोबर बहुसंख्य प्रजाही किल्ल्याच्या आतच रहात असे या भक्कम किल्ल्याला ८७ अर्धवर्तुळाकृती बुरुज आणि ८ भली मोठी प्रवेशद्वार होती. त्या काळी गोवळकोंडा हे ही-यांच्या बाजारपेठ, उत्पादनाच एक महत्वाचं केंद्रच होत.

              जगप्रसिद्ध कोहिनूर हिरा येथलाच! ४७० पाय-या ६१ मीटर्स उंचीवरील एके काळच्या या दणकट किल्यात ध्वनिशास्त्राचा अचूक वापर केलेला आहे. किल्याच्या पायथ्याच्या दरवाजाजवळ टाळी वाजवली असता तिचा आवाज माथ्यावर सुस्पष्ट  ऐकू  येतो. त्यामुळे कोणी आल्याची सूचना आगाऊ देता येत असे. आंध्र प्रदेश पर्यटन महामंडळामार्फत गोवळकोंड्याला रोज सांयकाळी इंग्रजीतून आणि काही दिवस हिंदीतूनही ध्वनी प्रकाश कार्यक्रमांचे आयोजन केल जात.

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                 2. चारमिनार, हैदराबाद .

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कुतब शाही साम्राज्य के पाँचवे शासक सुल्तान मुहम्मद कुली कुतब शाह ने 1591 में चारमीनार को बनवाया था। अपनी राजधानी गोलकोंडा को हैदराबाद में स्थानान्तरित करने के बाद उन्होंने हैदराबाद में चारमीनार का निर्माण करवाया। चारमीनार के वजह से आज हैदराबाद को वैश्विक पहचान मिली है।

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) के अनुसार, चारमीनार के बारे फ़िलहाल यह रिकॉर्ड दर्ज किया गया है की, “चारमीनार के निर्माण की वजह की बहोत सी कथाये है। जबकि बहोत से लोगो का यह मानना है प्लेग की बीमारी का संक्रमण रोकने के लिये चारमीनार को शहर के मध्य में बनाया गया है।” उस समय यह एक गंभीर बीमारी थी, जिससे इंसान मर भी सकता था। कहा जाता है की मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने यह मस्जिद बनवाकर यहाँ प्रार्थना की थी।

चारमीनार के बारे में कुछ रोचक बाते –

1. इमारत में बनी चार मीनार की वजह से इसकी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते है।

2. कहा जाता है की चारमीनार की चार मीनारे इस्लाम के पहले चार खलीफो का प्रतिक है।

3. मुहम्मद कुली कुतब शाह ने 1591 में इसका निर्माण किया था।

4. कहा जाता है की उसका निर्माण करने के बाद मुहम्मद कुली ने वहा अल्लाह से प्रार्थना की थी।

5. असल में मस्जिद चारमीनार के सबसे उपरी मंजिल पर बनी हुई है।

6. चारमीनार में पत्थरो की बालकनी के साथ ही एक छत और दो गैलरी भी है जो छत की तरह दिखाई देती है।

7. चारो मीनारों को एक विशिष्ट रिंग से चिन्हित किया गया है जिसे हम बाहर से देख सकते है।

8. मीनार की मुख्य गैलरी में 45 लोगो के प्रार्थना करने जितनी जगह है।

9. चारमीनार हैदराबाद की मुख्य इमारतो में से एक है।

10. उपरी मंजिल पर जाने के लिये आपको 149 हवाई सीढियाँ चढ़ने की जरुरत होगी। सभी मीनारे 149 हवाई सीढियो से पृथक की गयी है।

11. मीनार की हर तरफ एक बड़ा वक्र बना हुआ है जो 11 मीटर फैला और 20 मीटर ऊँचा है।

12. कहा जाता है की चारमीनार और गोलकोंडा किले के बिच एक गुप्त मार्ग भी बना हुआ है, जो पहले कुली कुतब शाह की राजधानी थी और आपातकालीन समय में इस गुप्त मार्ग से राजघराने के लोगो को सुरक्षित रूप से एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था। लेकिन आज भी उस गुप्त द्वार की वास्तविक जगह किसी को नही पता है।

13. हर एक वक्र पर एक घडी लगी हुई है जो 1889 में बनायी गयी थी।

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        3.नेहरू प्राणी संग्रहालय , हैदराबाद .
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मोठे प्राणी संग्रहालय पाहायचे असेल तर हैदराबादला जायला हवे . नेहरू जिऔलॉजिकल पार्क .

हे पार्क मीर आलाम टॅक जवळ आहे . हे पार्क सोमवारी बंद असते . इतर वेळी ८ ते ५.३० चालू असते . तिकिट दर २५ रुपये आहे .

हे पार्क ३८० एकरवर वसलेले आहे . हा पार्क फिरण्यासाठी दोन सोयी आहेत . एक म्हणजे बॅटरीवरची गाडी व दुसरी ट्रेन . आम्ही ट्रेन पकडली व पार्क पाहिला .

खूप वेगवेगळे प्राणी आहेत . कासव जवळ जवळ माझ्या कंबरे एवढे उंच आहे . जिराफ हा वेगळा प्राणी पाहिला . संपुर्ण दिवस कसा गेला हे कळलेच नाही .

एकदा भेट दयावी असे हे ठिकाण आहे .


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              4. फलकनुमा पैलेस, हैद्राबाद।

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फलकनुमा महल हैदराबाद, तेलंगाना, भारत में है। यह पलेस पैगाह परिवार का था, और बाद में जिस पर हैदराबाद के निजाम का अधिपत्य था।

यह पलेस चारमीनार से 5 किमी दूर फलकनुमा में 32 एकड़ (13 हेक्टर) क्षेत्र में है। यह हैदराबाद के प्रधान मंत्री नवाब विक्र-उल-उमरा और निजाम VI, नवाब मीरबूब अली खान बहादुर के चाचा और भाई, द्वारा बनाया गया था। फलकनुमा का उर्दू में अर्थ है “आकाश की तरह” या “मिरर ऑफ़ द स्काई”।

एक अंग्रेजी वास्तुकार ने महल को बनवाया था। निर्माण के लिए आधारशिला 3 मार्च 1884 को सर विकार द्वारा रखी गई थी; वह हैदराबाद के तीसरे निजाम एच. एच. सिकंदर जेह बहादुर के पोते थे।

निर्माण पूरा करने और महल को प्रस्तुत करने में नौ साल लग गए। यह पलेस पूरी तरह से इटालियन संगमरमर और ग्लास खिड़कियों के साथ बनाया गया है और 1,011,500 वर्ग फुट के क्षेत्र को कवर करता है।

महल एक बिच्छू के आकार में बनाया गया था जिसमें उत्तर में पंख के रूप में फैले दो डंडे थे। मध्य भाग मुख्य भवन और रसोईघर, गोल बंगला, जनाना महल और हरेम क्वार्टर दक्षिण में फैला हुआ है। नवाब एक उत्सुक यात्री था, और इटालियन और ट्यूडर का मेल इस वास्तु वास्तुकला में दिखाई देता हैं।

महल के मुख्य आकर्षण में से एक राज्य रिसेप्शन रूम है, जहां छत को सोने का पानी चढ़ा कर सजाया गया है।

महल में 60 कमरे और 22 हॉल हैं। इसमें चित्रकारी, मूर्तियों, फर्नीचर, पांडुलिपियां, किताबें और एक व्यापक जेड संग्रह शामिल है। इसमें एक नक्काशीदार अखरोट छत के साथ एक पुस्तकालय है, विंडसर कैसल में एक की प्रतिकृति; यह कुरानों का एक व्यापक संग्रह था।

डायनिंग हॉल 101 मेहमान बैठ सकते हैं। कुर्सियां हरे चमड़े के साथ नक्काशीदार रोसेवेड से बने हैं। रकाबियों चमचों इत्यादि का सेट सोना और क्रिस्टल से बना था।

यह महल निजाम परिवार की निजी संपत्ति थी, और आम तौर पर 2000 तक जनता के लिए खुला नहीं था।

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                 6.मक्का मस्जिद हैदराबाद

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मक्का मस्जिद, चारमीनार के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यह हैदराबाद और सिकंदराबाद की सबसे बड़ी मस्जिद है।

इस मस्जिद के निर्माण की शुरुआत 1617 में मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह ने की थी लेकिन इसको पूरा औरंगज़ेब ने 1684 में किया था।इसके विशाल स्तंभ और मेहराब ग्रेनाइट के एक ही स्लेब से बनाए गए हैं।पत्थर से बनी होने के बावज़ूद यह मस्जिद अपने निर्माण और स्थापत्य कला के लिहाज़ से बेजोड़ है।यह कहा जाता है कि यहाँ के मुख्य मेहराब को मक्का से लाए गए पत्थरों से बनाया गया था, इसलिए इसका नाम मक्का मस्जिद रखा गया।मक्का मस्जिद प्राचीन और अरबी वास्तु शिल्प के संगम के चलते पर्यटकों को आकर्षित करती है।मक्का मस्जिद लगभग 300 फीट एकड़ में बनी हुई है।एक साथ 10 हज़ार लोग इस मस्जिद में नमाज़अदा कर सकते हैं।इसके पास ही असफ़जाही राजाओं की क़ब्र भी देखी जा सकती है।

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                  7. NTR गार्डन, हैद्राबाद।

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आंध्र प्रदेश चे सर्वात लोकप्रिय मूख्यमंत्री श्री एन टी रामा राव याचे स्मृती प्रित्यर्थ ntr गार्डन स्थापना झाली।

हि गार्डन 36 एकर पसरलेली आहे। हि गार्डन तयार करण्यास 40 कोटी रुपये 2002 साली लागले।

सर्वांत छान वातावरण व संध्याकाळी फिरण्यास उत्तम गार्डन आहे।

या बागेत तुम्ही वेगवेगळी दालने पाहू शकता। जसे की, बोट राईड, जापनिझ गार्डन,कारंजे,मिनी ट्रेन।

सध्या येथे desert गार्डन पण आहे।

हि बाग हुसेन सागर च्या जवळ आहे।


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             10.सालारजंग संग्रहालय,हैद्राबाद।

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सालारजंग संग्रहालय हे भारताच्या हैदराबाद शहरातील एक प्रसिद्ध कलासंग्रहालय आहे. अनेक निजामकालीन ऐतिहासिक व दुर्मिळ वस्तू येथे प्रदर्शनासाठी ठेवल्या आहेत. सालारजंग हे भारतातील तिसरे मोठे संग्रहालय असून केवळ एका व्यक्तीने जमवलेल्या वस्तुंपासुन तयार झालेले हे जगातील सर्वात मोठे संग्रहालय आहे. सालारजंग संग्रहालयात अंदाजे ४३,००० वस्तु व ५०,००० पुस्तके आहेत.
हैद्राबादच्या सातव्या निजामाचे पंतप्रधान नवाब मीर युसुफ अली खान सालारजंग (तिसरे) ह्यांनी ह्या दुर्मिळ वस्तू जमविण्यासाठी ३५ वर्षे मेहनत घेतली व त्यासाठी आपल्या मिळकतीतील मोठा हिस्सा खर्च केला.


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                 11. लुंबनी पार्क, हैदराबाद।

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हैदराबाद का लुंबनी पार्क हुसैन सागर झील के ठीक बगल में स्थित है। शहर के बीच में होने और दूसरे पर्यटन स्थलों से नजदीकी के कारण यह हैदराबाद का एक चर्चित आकर्षण है। वैसे तो इस पार्क का निर्माण 1994 में किया गया था, पर उसके बाद से इसे हर आयु वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए इसका कई बार नवीनीकरण किया गया।

आज लुंबनी पार्क में लेजर ऑडिटोरियम, बोटिंग की सुविधा, गार्डन और म्यूजिकल फाउंटेन है। इससे यह पार्क परिवार के साथ पिकनिक मनाने का एक अच्छा विकल्प बन गया है।

यहां का लेजर ऑडिटोरियम देश में अपने तरह का पहला लेजर ऑडिटोरियम है और यहां 2000 लोगों के बैठने की सुविधा है। आप हर दिन यहां हैदराबाद के इतिहास पर आधारित शो को हिंदी और इंग्लिश में देख सकते हैं।

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              12.  स्नो वर्ल्ड, हैदराबाद।

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स्नो वर्ल्ड मनोरंजन की दृष्टि से मील का पत्थर है।

स्नो वर्ल्ड का उद्घाटन सन् 2004 में किया गया था।स्नो वर्ल्ड दुनिया का सबसे बड़ा और भारत का पहला स्नो फॉल थीम उद्यान है।

यह उद्यान 17 हज़ार वर्ग फुट में फैला हुआ है।

इस उद्यान का तापमान -5 से 0 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है।

इस उद्यान में बर्फ़ से एक पूरा माहौल तैयार किया गया है, यहाँ पोलर बियर व पेंगुइन की बर्फ़ से बनी मूर्तियाँ और इग्लू जैसे घर भी बने हुए हैं।इस उद्यान में बर्फ़ स्लाइड का मजा भी लिया जा सकता है।इसमें हर ग्रुप को भेजने के दौरान 10 मिनट के लिए स्नो फॉल भी की जाती है।यहाँ पर कपकपा देने वाली ठंड के माहौल में डांस का आनन्द भी किया जा सकता है।


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               13.  मालवां महल, हैदराबाद।

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मालवा महल आंध्र प्रदेश राज्य के  हैदराबाद  शहर में स्थित है।

यह महल लकड़ी से बना हुआ है। इस महल के खिड़कियों और दरवाजों पर बहुत ही सुंदर नक़्क़ाशी की गई है।

यह महल मुग़ल और राजस्थानी शैली में बने उन महलों में से एक है जो अभी तक बचे हुए हैं।

मालवा महल का निर्माण सागरमल ने कराया था।


सागरमल हैदराबाद के पहले निज़ाम के राजस्व की देखरेख करते थे।इन्हीं के नाम पर इसके वंश का नाम मालवा पड़ा।

इस महल के परिसर के तीन मुख्य भाग हैं-दो मंजिला आवासीय क्वाटर्स अर्धवृत्ताकार द्वारविशाल आंतरिक परिसर- जिसके बीच में एक फ़व्वारा है।

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                 14.   लाड बाज़ार ,हैदराबाद।

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लाड बाज़ार हैदराबाद के सबसे पुराने ख़रीददारी केंद्रों में से एक है।

लाड बाज़ार चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध है।ये चूड़ियाँ कांच, लाख, मोती समेत कीमती धातुओं की भी होती हैं।ये चूड़ियाँ बहुत ख़ूबसूरत होती हैं। ख़ूबसूरत होने के साथ-साथ ये सस्ती भी होती हैं।

लाड बाज़ार चूड़ियों के अलावा शादी के कपड़ों, मेंहदी, सौंदर्य प्रसाधन, बर्तन आदि के लिए भी मशहूर है।


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                        हैदराबाद कसे पहाल ?

👍 Day 1

1. चारमिनार

वेळ 2 तास

2. मक्का मस्जिद ( चारमिनार जवळील )

वेळ 1:30

3. सालार जंग संग्रहालय

वेळ 3 तास कमीतकमी

4. संध्याकाळी लुंबिनी पार्क पाहणे।


👍 Day 2

1. गोवळकोंडा किल्ला

वेळ 3 तास

2. प्राणी संग्रहालय

वेळ 3 तास

3. संध्याकाळी NTR गार्डन पाहणे।

👍 Day 3

1. फलक नुमा पॅलेस

वेळ 2 तास

2. स्नो वर्ल्ड

वेळ 2 तास

3. लाड बाजार

वेळ 2 तास

4. संध्याकाळी बिर्ला मंदिर पाहणे। येथे डोळ्याचे पारणे फिटतील असे दृश्य आहे।

👍 Day 4

1. हुसेन सागर पाहणे। बोटींग करणे।

2. बुद्ध पुतळा पाहणे

सर्व वेळ 3 तास

3. राज्य संग्रहालय

वेळ 2 तास

4. संध्याकाळी नेक लेस रोड पाहणे।

👍 Day 5

रामजी फिल्म सिटी पाहणे।

जाताना वाटेत sanghi मंदिर आहे ते पाहणे।

वेळ पूर्ण दिवस

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Saturday, September 15, 2018

किल्ल्यांची माहिती

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                    किल्ल्यांची माहिती

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किल्ला म्हणजे काय ?
त्याचे प्रकार किती ?
महाराष्ट्रासह देशात असे किती किल्ले आहेत ?
 कुठे आहेत ?
तिथे पोचायचे कसे ?
ते किल्ले पहायचे कसे ?
 त्यांचे ऐतिहासिक महत्त्व काय ?
 त्यांची आजची परिस्थिती कशी आहे ?
असे अनेक प्रश्न आपल्यासमोर येतात. या सर्व प्रश्नांची उत्तरे जाणून घेण्यासाठी सर्वप्रथम किल्ला म्हणजे काय हे जाणून घेणे आवश्यक आहे.



*किल्ला म्हणजे काय ? :* महाराष्ट्राच्या पश्चिम भागात सह्याद्री पर्वत आहेत. आणि याच परिसरात आपल्याला सर्वाधिक किल्ले पहायला मिळतात. डोंगर, कडे कपारीमध्ये किल्ला बांधण्याचा मुख्य उद्देश काय असावा, असा प्रश्न देखील आपल्या समोर येतो. परंतु जिथे राहून शत्रूच्या हालचालींवर नजर ठेवता येईल, वेळ प्रसंगी शत्रूवर हल्ला करता येईल आणि नैसर्गिक किंवा बांधकाम करून दुर्गम केलेल्या ठिकाणी राहिल्यामुळे आपले संरक्षण ही होईल, अशा ठिकाणीच किल्ले बांधलेले दिसून येतात. म्हणजेच इतिहासात स्वतःचे साम्राज्य शत्रूपासून सुरक्षित ठेवण्यासाठी आणि वेळ प्रसंगी राहण्यासाठी बांधण्यात आलेल्या अशा ठिकाणांना किल्ला असे म्हणतात.



*किल्ल्याचे प्रकार :*
 किल्ल्याचे बांधकाम करण्यात आलेल्या स्थानावरून त्याचे प्रकार पडतात. आपल्याला किल्ल्याचे मुख्य तीन प्रकार माहित असतात. गिरिदुर्ग म्हणजेच डोंगरी किल्ला, जलदुर्ग म्हणजेच समुद्रात बेटांवर बांधण्यात आलेला किल्ला आणि भुईदुर्ग म्हणजेच सपाट भू भागावर बांधण्यात आलेला किल्ला. परंतु या व्यतिरिक्त देखील किल्ल्यांचे काही प्रकार आहेत.

वनदुर्ग म्हणजे अरण्यात असलेला किल्ला, गव्हरं म्हणजेच एखाद्या गुहेचा उपयोग करून त्याचा वापर किल्ल्यासारखा होत असेल तर, कर्दमं म्हणजे चिखलात किंवा दलदलीच्या प्रदेशात बांधण्यात आलेला किल्ला, तसेच केवळ कोट किंवा गढी स्वरूपातील इमारती किल्ल्याप्रमाणेच मानल्या जातात.



*महाराष्ट्रातील किल्ल्यांचा इतिहास :*
 महाराष्ट्र हा असा प्रदेश आहे, ज्या ठिकाणी वेगवेगळ्या प्रदेशातील परकीयांनी राज्य केलेले आहे. त्यामुळे महाराष्ट्रात बांधण्यात आलेल्या किल्ल्यांवर या परकीयांच्या बांधकाम कौशल्याची छाप दिसून येते. महाराष्ट्रात बांधण्यात आलेल्या किल्ल्यांमध्ये आफ्रिकन लोकांपासून ते युरोपीय लोकांपर्यंत सर्वांच्या कौशल्याचा सहभाग आहे. दोन हजार वर्षांपूर्वीच्या सातवाहन राजवंशापासून ते राष्ट्रकूट, चालुक्य, शिलाहार, यादव, कदंब, बहमनी, मोगल, दक्षिणी पातशाह्या, मराठेशाही, पेशवाई, हबशी, पोर्तुगीज, डच आणि इंग्रज अशा वेगवेगळया काळातल्या सत्ताधीशांनी हे किल्ले बांधलेले आहेत.



*किल्ल्याचे भाग :*
 किल्ला बांधत असताना किंवा किल्ला बांधणीची जागा हेरत असताना विशेष काळजी घेतली जात असे, त्यानुसार किल्ला बांधलेल्या जागेचे चार भाग पडतात. घेरा, मेट, माची आणि बालेकिल्ला हे किल्ल्याचे मुख्य भाग आहेत. घेरा म्हणजे किल्ल्याच्या पायथ्याजवळ असलेले गाव, मेट म्हणजे किल्ला आणि गाडीतळाजवळील गाव यांच्यामध्ये असणारी मोक्याची तटबंदी रहित जागा, माची म्हणजे किल्ल्यावरील बालेकिल्ल्याखालील सपाट प्रदेश आणि शेवटी बालेकिल्ला म्हणजे किल्ल्यावरील सर्वात संरक्षित ठिकाण होय.

*किल्ल्यांवरील ठिकाणांची नावे*

किल्ल्यावर बांधण्यात आलेल्या प्रत्येक इमारतीस, प्रत्येक बांधकामास विशिष्ठ नावे देण्यात आलेली आहेत. काही किल्ल्यांना विशिष्ठ प्रकारे बांधण्यात आलेल्या माच्या, तटबंदी, प्रवेशद्वार असतात. त्यानुसार त्या किल्ल्यांचे महत्व बदलत जाते.

*महादरवाजा :*
 किल्ल्यात प्रवेश करण्यासाठी बांधण्यात आलेल्या मुख्य प्रवेशद्वारास महादरवाजा असे म्हणतात. काही किल्ल्यांवर महादरवाज्याच्या संरक्षणासाठी बुरुजांची रचना केलेली असते. काही किल्ल्यांवर एकामागोमाग एक असे अनेक दरवाजे असतात. प्रवेशद्वाराच्या आतील बाजूस पहारेकऱ्यांना बसण्यासाठीची जागा ठेवलेली असे, त्यास ‘देवडी’ असे म्हणतात.

*नगारखाना :*
 किल्ल्याच्या मुख्य प्रवेशद्वारावर नगारखाना असे. गडाची दारे उघडताना आणि बंद करत असताना तसेच महत्त्वाच्या प्रसंगी येथे नगारे वाजवले जात.

*तटबंदी :*
 किल्ल्याची माची आणि बालेकिल्ला या भागात दगडी बांधकामात बांधण्यात आलेल्या भिंती आहेत, या भिंतींना ‘तटबंदी’ असे म्हणतात. किल्ल्याच्या दिशेने तोफेच्या गोळ्याचा मारा झाला, तर किल्ल्यावर त्याचा परिणाम कमी व्हावा, याकरिता तटबंदीची भिंत नागमोडी बांधत असत.

*बुरुज :*
 तटबंदीमध्येच काही ठराविक अंतरावर तटबंदीपासून पुढे आलेले बुरुज बांधले जात असत. हे बुरुज काही किल्ल्यांवर अर्धगोलाकार, त्रिकोणी, षटकोणी तर काही किल्ल्यांवर कमळाच्या फुलाच्या आकारात बांधण्यात आलेले आहेत. या बुरुजांवर तोफा ठेवल्या जात असत.

*ढालकाठी :*
 ढालकाठी म्हणजे निशाण रोवण्यासाठी बांधलेला दगडी ओटा होय. ढालकाठी बहुधा एखाद्या बुरुजावर उभारण्यात येत असे.

*जंग्या :*
 तटबंदी आणि बुरुजावरून गोळीबार करण्यासाठी ठिकठिकाणी छिद्रे ठेवलेली असत, त्यांना जंग्या म्हणतात.

*चऱ्या :*
 किल्ल्याच्या तटबंदी आणि बुरुजावर घडीव किंवा पाकळ्यांच्या आकाराचे दगड ठेवलेले असत, त्यांना चऱ्या असे म्हणतात. या चऱ्यांच्या आड लपून किल्ल्यावरून गोळीबार करता येत असे.

*फांजी :*
 किल्ल्याच्या तटबंदीवर पहारेकऱ्यांना गस्त घालण्यासाठी जागा ठेवलेली असे, त्यास ‘फांजी’ म्हणतात.

*धान्य कोठार (अंबरखाना) :*
किल्ल्यावर धान्य साठवण्यासाठी बांधलेली इमारत म्हणजे धान्य कोठार (अंबरखाना)

*दारू कोठार :*
 किल्ल्यावरील दारूगोळा या कोठारामध्ये साठवला जात असे. हे दारू कोठार लोक वस्तीपासून दूर बांधले जात असे.

*पागा :*
 किल्ल्यावर घोडय़ांना बांधून ठेवण्यासाठी बांधण्यात आलेल्या जागेस पागा असे म्हणतात.

*चोर दरवाजा :*
 प्रत्येक किल्ल्यावर येण्यासाठी महादरवाजा सोडून इतरही एक ते तीन दरवाजे असत, छोट्या वाटेचे अथवा चढाईस कठीण असलेल्या अशा दरवाज्यांना चोर दरवाजा असे म्हणत असत. हे चोर दरवाजे तटबंदीमध्ये लपवलेले असत. छुप्या पद्धतीने केल्या जाणाऱ्या अनेक कामांसाठी या दरवाज्यांचा उपयोग होत असे.

*पाण्याचे टाक/ तलाव/ विहीर :*
 किल्ल्यावर पिण्याच्या पाण्याचा साठा असावा या उद्देशाने ठिकठिकाणी टाक, तलाव आणि विहिरी बांधलेल्या असत. या पाण्याच्या साठ्यांची विशेष काळजी घेतली जात असे.

*राजवाडा अथवा इमारती :*
 किल्ल्यावर राहणाऱ्या खास मंडळींसाठी राजवाडे, कचेरी, सदर इत्यादी इमारती बांधलेल्या असत. काही किल्ल्यांवर अशा काही विशिष्ठ इमारती आहेत, ज्यांना विशेष महत्व आहे.

*शिलेखाना :*
 शिलेखाना म्हणजे चिलखते आणि शस्त्रास्त्रे ठेवण्याची जागा होय. याठिकाणी अवजारांना धार लावणारे शिकलगार आणि लोहार नेमलेले असत.

*कडेलोटाची जागा :*
 गुन्हेगारास शिक्षा म्हणून, त्याला किल्ल्यावरून खाली ढकलून दिले जात असे, किल्ल्यावरील ज्या ठिकाणावरून खाली ढकलले जात असे, त्या जागेस कडेलोटाची जागा असे म्हणत.

किल्ला कसा पहावा याचं देखील एक तंत्र असतं, प्रत्येकाने किल्ल्याची वाट चालत असताना हे तंत्र पाळत आणि किल्ल्याचे सौंदर्य अनुभवत दुर्ग भ्रमंती करायला हवी.
दुर्ग भ्रमंती करत असताना ज्या व्यक्तीचे त्या किल्ल्यासंबंधी काही वाचन आहे, ती व्यक्ती कल्पनाशक्तीच्या आधारे किल्ल्यांचे सौंदर्य आणि इतिहास अनुभवू शकते.


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Tuesday, September 11, 2018

डोड्डा गणेश मंदिर ,बेंगलोर।

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                   डोड्डा गणेश मंदिर ,बेंगलोर।

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 डोड्डा गणेश मंदिर हे बेंगलोर मधील आणखी एक लोकप्रिय ठिकाण आहे। हे बुल टेम्पलच्या अगदी जवळ आहे। 500 फूट पेक्षा अधिक आंतर नसेल। मन प्रसन्न होणारे आणखी एक सुंदर असे ठिकाण...! मंदिर हे आकाराने खूप मोठे नाही, पण मूर्ती मात्र अपवाद आहे। मूर्ती ही 18 फूट उंच व 16 फूट रुंद आहे। ही मूर्ती काळ्या पाषाणाची आहे। डोळे तर खूपच विलोभनीय आहेत। या मंदिराच्या गाभाऱ्यात मात्र प्रवेश नाही। हे मंदिर महाराज केम्पेगौडा यांनी बांधलेले आहे। एकदा त्यांना गणपतीचा आकार असलेला खूप मोठा दगड दिसला। त्या दगडाला घडवून आताची मूर्ती तयार झाली। ह्या मूर्तीला आता क्रीम कलरचा एक हात मारलेला आहे। मी गेलो होतो त्यावेळी नेमकी आरती चालू होती। मग प्रसाद घेऊनच बाहेर पडलो।





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Monday, September 3, 2018

श्री क्षेत्र देहू, पुणे .

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                  श्री क्षेत्र देहू, पुणे .

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        पुण्यापासून मुंबईकडे जाताना २५ कि. मी. वर देहू हे इंद्रायणी नदीच्या काठावर असलेले लहानसे गाव. वारकरी आणि भक्ती संप्रदायाचे एक मोठे संत - श्री तुकाराम देहू गावी राहत. गाथा आणि अनेक अभंगांच्या रूपात संत तुकाराम महाराज आजही आपल्याला भेटतात. श्री संत तुकाराम महाराज हे श्री विठोबाचे नि:स्सिम भक्त. त्यामुळे प्रत्येक आषाढी एकादशीला संत ज्ञानेश्र्वर महाराजांप्रमाणेच तुकाराम महाराजांचीही पालखी पंढरपूरला जात असते.
        संत तुकाराम महराजांचे जन्मस्थान म्हणून हे प्रसिद्ध आहे. फाल्गुन वद्य द्वितीयेला (तुकारामबीज) येथे मोठी यात्रा भरते. त्याच दिवशी तुकाराम महाराजांनी सदेह वैकुंठगमन केले असे मानतात. विठ्ठल मंदिर, जुने शिवमंदिर, इंद्रायणीचा डोह ही देहूतील बघण्यासारखी ठिकाणे आहेत. जवळच रामचंद्र डोंगर, भंडारा डोंगर येथे कोरीव लेणीही आहेत. संत तुकाराम महाराज चिंतनासाठी, साधनेसाठी भंडारा डोंगरावर जात असत. प्रत्येक गुरुवारी व एकादशीच्या दिवशी मंदिरात कीर्तन होते. सध्या दिसणारे मंदिर इ. स. १७२३ मध्ये संत तुकारामांचा सर्वात लहान मुलगा नारायणबाबा यांनी बांधून घेतले अशी नोंद आढळते.









मंदिरात प्रवेश करतानाच प्रथम आपल्याला गरूडावर बसलेले तुकाराम महाराज मुर्ती दिसते . आत विठ्ठल रूक्मिणी मंदिर आहे . तसेच महाराजांचे हस्तलिखीत अभंग पण आहेत .

देहूत आजून एक पाहण्यासारखे ठिकाण म्हणजे गाथा मंदिर होय . जिथे गाथा बुडवली त्या जवळ गाथा मंदिर बांधलेले आहे . संपुर्ण गाथा संगमरवरी फरशीवर कोरलेली आहे .आत जाताच प्रथम तुकाराम महाराजांची ७ फूट उंचीची मूर्ती दिसते .

हे मंदिर मी तीन वेळा पाहिले . प्रत्येक वेळी बदल दिसला .

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Sunday, September 2, 2018

श्री रावणेश्वर महादेव मंदिर, कोल्हापूर।

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       श्री रावणेश्वर महादेव मंदिर, कोल्हापूर।

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          नुकताच काजवा महोत्सव पहिला होता। सौच्या म्हणण्याप्रमाणे आजून चार पाच दिवस तरी बार्शीला जायला अवधी होता। मग काय पहायचे ? प्रश्न मोठा होता। आणि विशेष म्हणजे उत्तरही मलाच शोधायचे होते। मग एका मंदिराचे नाव आले पुढे...! रावनेश्वर मंदिर!!!!
       नाव ऐकून थोडे आश्चर्य वाटले !!!! पण सुरुवातीला तरी त्यावर विश्वास ठेवायला हवा होता। हे मंदिर याच शहरात होते हे ही नवलच !!! मी याआधी कधीच हे ऐकले नव्हते। विचार करण्यापेक्षा काढली गाडी निघालो मंदिराकडे!!!
       मंगळवार पेठ मधील साठमारी की सातमारी गल्ली शोधायची होती। गल्लीचे नाव अजूनही कळलेले नाहीच। प्रत्यक्ष रावनेश्वर मंदिर कोठे हेच विचारले। जाई पर्यंत जुने किंवा दगडी बांधकाम वगैरे असलेले असेल असे वाटले होते। पण " भव्य " या एकाच शब्दात वर्णन करता येईल असे हे होते।
            हे मंदिर इतर मंदिरासारखे नाही , हेच याचे वैशिष्ट्य.....!!!
         हे मंदिर शिवलिंगाच्या आकाराचे आहे। म्हणजे बाहेरून पाहिले तर मोठे शिवलिंग च्या आत लहान शिवलिंग। मंदिरात प्रवेश करण्यापूर्वी प्रवेशद्वारावर शंकराची ध्यानस्थ मूर्ती दिसते। या मूर्ती च्या एका बाजुला मोर व दुसऱ्या बाजूला नंदी आहे। आत जाताच मंदिराच्या वॉल कंपौंड ची डाव्या बाजूच्या भिंतीला पाहून आश्चर्य वाटले। येथे या भिंतीवरती आपणास बारा ज्योतिर्लिंगाची उठाव शिल्पे पहावयास मिळतात।ही शिल्पे पहात येतानाच दोन स्तंभांवरती शृंगी आणि भृंगी हे दोन शिवगण दिसतात। विशेष म्हणजे हे ३ पायांचे असून यातील कुठलाही एक पाय झाकला असता उरलेल्या दोन मध्ये नृत्यमुद्रा दिसते। यातील शृंगीच्या हातात टाळ तर भृंगीच्या हातात विणा आहे। या दोन शिवगणांचे दर्शन घेत आपण मंदिराच्या मुख्य दाराजवळ येतो। तीर्थ दाराच्या दोन बाजूला काचेमध्ये आपणास उजवीकडे विरभद्राचे तर डावीकडे भैरवाचे चित्र दिसते। यातील वीरभद्र म्हणजे भगवान शंकराच्या तमोगुणाचा अंश। याची कहानी पुढीलप्रमाणे ......
      सती दाक्षाय हिने प्रजापतीच्या यज्ञासमोर स्वतःचा देह नष्ट करून घेतला। तेंव्हा तो यज्ञ मोडण्यासाठी महादेवानी वीरभद्रला प्रकट केले। तेंव्हा या वीरभद्रने दक्ष प्रजापतीचे मस्तक उडविले । पण नंतर महादेवांनी बकऱ्याचे मस्तक जोडून त्यास जिवंत केले। अर्थातच ऐकीव...!
              भैरव हा ब्रम्हदेवाच्या गर्वहरणाने प्रकटलेला अंश असून हा भैरव क्षेत्रपाल म्हणून काम करतो। या ६४ भैरवांचा प्रतिनिधी म्हणून असा एक भैरव इथे चित्रित केला आहे ।
       तिथून पुढे येताच आपली नजर जाते ती कोपऱ्यात असणाऱ्या गंगा व गौरी यांच्या मूर्तीकडे। उजव्या बाजूस कमळात बसलेली आणि मगरीचे वाहन असणारी देवी गंगा होय।वरील दोन हातात कमळ, कलश धारण करून खालील दोन हातांनी भक्तास अभय देत आहे।
         डावीकडे देवी गौरी वरील उजव्या हातात त्रिशूल, डाव्यात कुंकवाचा करंडा धारण करून विराजमान झाली आहे।












    जवळच्या भिंतीवर रावणेश्वर मुर्तीकडे मुख करून नमस्कार केलेली त्रिजटा पहावयास मिळत।
         मंदिराच्या गाभाऱ्यातून दर्शन घेऊन बाहेर पडताच वर मोठ्या आकारात महालक्ष्मी , तुळजाभवानी, रेणुकामाता व सप्तशृंगी या साडेतीन शक्तीपीठ देवींच्या फोटो प्रतिमा पहावयास मिळतात।
        या प्रतिमांच्या डाव्या बाजूस देवी सीता वाळूचे पिंड तयार करीत असून, या कामात त्यांना राम, लक्ष्मण व हनुमान सहाय्य करीत असलेले उठावदार शिल्प दिसते। हे पाहत आपण लक्ष्मण लिंगाकडे येतो। त्यानंतर आपणास अमरनाथ गुफा, हिमलिंग प्रतिकृती ,तसेच लक्ष्मणनेश्वर आणि गणपतीचे आपणास दर्शन होते।
                या मंदिराचे सर्वात अधिकमहत्वाचे वैशिष्ट म्हणजे याचे शिखर होय । या शिखराच्या पूर्वेस भगवान महादेव, देवी पार्वती, गणपती, कार्तिक यांच्या मूर्ती आहेत। म्हणजेच भगवान शिव सहपरिवार सहकुटुंब विराजमान आहेत।
        उत्तरेस पाच मुखे असणारी महादेवाची मूर्ती आहे। महादेवाच्या या पंचमुखी रुपालाच सदाशिव असे म्हणतात।
       पश्चिम दिशेला भगवान शिव नटेश्वर रुपात आपल्याला दिसतात।
        या सर्वापेक्षा मला मला नवल वाटलेले शिल्प दक्षिणेस आहे । ते म्हणजे शिवआराधना करणारा रावण। साधारण दोन तास लागले हे मंदिर बारकाईने पाहायला। तो पर्यंत खिशातील भ्रमणध्वनी वाजला आणि निघालो घरी..........!

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